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कलाकार तो कई आते-जाते हैं, लेकिन सदियों में एक बार कोई अदाकार-ए-आज़म आता है..

बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं.. उसके लिए माफी मांगती हूं.. आज सुबह उठते ही जब ये खबर पढ़ी कि दिलीप कुमार साहब नहीं रहे.. तो सोचा आज तो लिखना बनता ही है..

कलाकार तो कई आते-जाते हैं, लेकिन सदियों में एक बार कोई अदाकार-ए-आज़म आता है..

कलाकार या स्टार्स तो आते-जाते रहते हैं.. लेकिन सदियों में एक बार ही कोई अदाकार-ए-आज़म आता है.. दिलीप कुमार अभिनेता के साथ-साथ अभिनय की एक चलती फिरती यूनिवर्सिटी भी रहे हैं, उनकी फिल्में देख देखकर कई बड़े सितारों ने एक्टिंग जो सीखी है.. और मैं तो बचपन से ही उनकी फैन रही हूं..

चलिए पहले थोड़ा उनके बारे में जान लेते हैं..

करीब साढ़े पांच दशक के एक्टिव करियर मे दिलीप कुमार ने सिर्फ 61 फिल्मों में काम किया.. आजकल के कलाकारों से बिल्कुल परे थे उनके विचार.. दिलीप जी का हमेशा से यही मानना रहा है कि कलाकार को गुलाब की पंखुड़ियों की तरह एक-एक करके खिलना चाहिए.. ये नहीं कि एक ही बार में अपना सब कुछ दिखा दिया.. यही वजह है कि दिलीप कुमार ने क्वाटिंटी से ज़्यादा क्वालिटी पर ध्यान दिया..


दिलीप कुमार जी यूसुफ़ ख़ान के तौर पर पेशावर के फल-कारोबारी गुलाम सरवर खॉन के यहां 11 दिसंबर 1922 को जन्मे थे.. मुंबई से 200 किलोमीटर दूर देवलाली कैंट स्टेशन में स्कूली पढ़ाई के दौरान दिलीप कुमार का पहला प्रेम फिल्में नहीं फुटबॉल था... देवलाली में दिलीप कुमार आठ साल रहे और इस दौरान उन्होंने एक भी फिल्म नहीं देखी.

कॉलेज के दिनों से लेकर अपने अंतिम समय तक दिलीप कुमार ने अपना हेयर-स्टाइल नहीं बदला.. माथे पर झूलते पफ में सात दशक बाद भी कोई फर्क नहीं आया.. दिलीप साहब को कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी फिल्में देखने का बड़ा शौक था.. सिनेमा हाल के लेफ्ट में सबसे कार्नर वाली सीट को दिलीप साहब फिल्म देखने के लिए सबसे बढ़िया एंगल मानते थे.. पढ़ाई पूरी करने के बाद दिलीप साहब ने खुद की पहचान बनाने का फैसला किया.. उस वक्त तक फिल्में दिलीप कुमार के ज़ेहन में दूर-दूर तक नहीं थी.


दिलीप कुमार ने मुंबई से पुणे आकर ब्रिटिश आर्मी में कैंटीन मैनेजर की नौकरी कर ली. इस नौकरी के लिए दिलीप कुमार को 35 रुपये वेतन मिलता था.. जल्दी ही दिलीप कुमार को आर्मी मेस में रिफ्रेशमेंट रूम चलाने का ठेका मिल गया.. धंधा चल निकला और आमदनी 800 रुपये हर महीने से ऊपर जा पहुंची.. उस वक्त 800 रुपये बहुत मोटी रकम मानी जाती थी..


अच्छा खासा बैंक बेलेंस जमा करने के बाद दिलीप कुमार मुंबई वापस आ गए.. उन दिनों बॉम्बे टॉकीज सबसे बड़ा प्रोडक्शन हाउस हुआ करता था.. बॉम्बे टॉकीज को सुंदर और अच्छी कद काठी वाले युवा चेहरों की तलाश थी.. प्रोडक्शन हाउस के लोगों ने ही बॉम्बे टॉकीज की कर्ता-धर्ता देविका रानी से दिलीप कुमार की मुलाकात कराई.. देविका रानी दिलीप कुमार की शख्सीयत और बोलने के अंदाज़ से इतनी प्रभावित हुईं कि बिना स्क्रीन टेस्ट ही उन्हें ज्वार भाटा (1944) के लिए साइन कर लिया..


तब तक दिलीप कुमार यूसुफ़ ख़ान ही थे.. देविका रानी ने ही उनके स्क्रीन के लिए तीन नाम सुझाए थे. जंहागीर, वासुदेव और दिलीप कुमार. युसूफ़ खान को दिलीप कुमार तीनो नामों में सबसे कम पसंद था..  लेकिन देविका रानी को यही नाम सबसे ज़्यादा पसंद आया.

ज्वार भाटा रिलीज़ होने के बाद दिलीप कुमार की मोतीलाल जैसे दिग्गज कलाकार ने तारीफ की थी और कहा था कि यही तेवर बनाए रखना, हिंदी सिनेमा तुम्हे सिर-आंखों पर बिठाएगा. बॉम्बे टाकीज से दिलीप कुमार का 625 रूपये महीने पर दो साल का कांन्ट्रेक्ट बन गया था..


1947-48 में आई मेला और जुगनू ने दिलीप कुमार को स्टार बना दिया.. महबूब खान की फिल्म अंदाज (1949) से दिलीप कुमार को ट्रेजिडी कुमार का नाम मिला.. अंदाज में दिलीप कुमार के साथ राजकपूर और नर्गिस सह-कलाकार थे.. 1961 में दिलीप कुमार ने भाई नासिर खान के साथ फिल्म गंगा जमुना बनाई.. फिल्म हिट भी रही लेकिन उसके बाद दिलीप कुमार खुद फिल्में नहीं बनाईं.. 1966 में सायरा बानू से शादी के वक्त दिलीप कुमार 44 और सायरा बानू 22 साल की थीं.. शादी के बाद दिलीप कुमार की एक संतान भी हुई लेकिन जीवित नहीं रह सकी.. उसके बाद उनकी कोई संतान नहीं हुई..


1998 में आई किला दिलीप कुमार की आखिरी रिलीज फिल्म थी.1994 में मुगले-आजम और 1997 में नया दौर को कलर करने के बाद दोबारा रिलीज किया था.. धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन के साथ तमाम कलाकारों के दिलीप कुमार रोल मॉडल रहे हैं.


जन्म- 11 दिसंबर 1922 पेशावर
निधन- 7 जुलाई 2021 मुंबई


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