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"सिस्टम" के आगे हिम्मत हार चुके लोगों में "राहुल वोहरा" अकेले नही हैं

एक बार राहुल की मनोस्थिति में खुद को रखकर देखिए.. दिमाग में लगे कई जाले और आंखों पर लगा राजनीतिक चश्मा हमेशा के लिए उतर जाएगा..

"सिस्टम" के आगे हिम्मत हार चुके लोगों में "राहुल वोहरा" अकेले नही हैं
बीते डेढ़ साल में कोरोना का कहर लोगों पर काल बनकर टूट रहा है.. और कोरोना की इस दूसरी लहर के बीच 'सिस्टम' का निकम्मापन साफ देखने को मिला.. खुद तो बिल में घुसकर बैठ गए.. और प्रजा को छोड़ दिया महामारी से जूझने के लिए.. क्योंकि क्या राजा क्या प्रजा, कोरोना के लिए सब बराबर.. और इसी बीच सिस्टम के इसी निकम्मेपन को देख एक अभिनेता और यूट्यूबर राहुल वोहरा अपनी मौत की 'भविष्यवाणी' कर देता है..


उसकी भविष्यवाणी नास्त्रेदमस की तरह सच हो जाती है.. लेकिन कहीं न कहीं एक आस तो रही होगी.. जिंदा रहने की आस.. अच्छे इलाज की आस.. लेकिन नहीं.. अच्छे इलाज के इंतजार में ये अभिनेता इस दुनिया को अलविदा कह देता है.. वैसे सिस्टम के आगे हिम्मत हार चुके लोगों में राहुल वोहरा अकेले नही हैं... देश के हर कोने से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं. राहुल वोहरा एक चर्चित चेहरा थे, तो उनका नाम ज्यादा चर्चा में है.


लेकिन मेरा देश अब ये बात जान और समझ चुका है कि कोरोना से जंग हारने वाले लोग 'सिस्टम' के लिए केवल 'आंकड़ा' भर है..

बुरी खबरों से चाहे सोशल मीडिया हो, अखबार हो या न्यूज चैनल सब भरे पड़े हैं, कोई ऑक्सीजन के लिए गुहार लगा रहा है, कोई इलाज के लिए, तो कोई दवाओं के लिए. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में कोई न कोई शख्स हर रोज ही 'सिस्टम' के लचर रवैये से जिंदगी की जंग हार रहा है.. लेकिन राहुल वोहरा ने अपनी मौत से पहले और उसके भी पहले 4 मई को फेसबुक पोस्ट किया था.. जिसमें वो मदद की गुहार लगा रहे थे..

उन्होंने लिखा था कि "मैं कोविड पॉजिटिव हूं.. लगभग चार दिन से एडमिट हूं, लेकिन कोई रिकवरी नहीं.. क्या कोई ऐसा अस्पताल है, जहां ऑक्सीजन बेड मिल जाए? क्योंकि यहां मेरा ऑक्सीजन लेवल लगातार नीचे जा रहा है.. और दिल्ली में कोई देखने वाला नहीं. मैं बहुत मजबूर होकर ये पोस्ट कर रहा हूं, क्योंकि घरवाले कुछ संभाल नहीं पा रहे.."

 

उस वक्त वो जिंदा थे.. जाहिर है तब भी उन्हें इलाज अच्छा मिल जाता तो शायद वो बच सकते थे.. इतने बड़े सिस्टम का एक भी आदमी अगर समय पर संज्ञान ले लेता..तो शायद वो हमारे बीच होते..


मौत से पहले उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि 'मुझे भी अच्छा इलाज मिल जाता, तो मैं भी बच जाता'. उ्न्होंने अपनी इस पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को टैग किया था. पोस्ट के आखिरी में उन्होंने लिखा कि जल्द जन्म लूंगा और अच्छा काम करूंगा. अब हिम्मत हार चुका हूं... एक शख्स जो अपनी मौत को घड़ी की सूई के आगे बढ़ने के साथ लगातार अपने पास आता देख रहा हो, उस पर क्या बीत रही होगी, ये वो खुद ही बता सकता था. लेकिन राहुल वोहरा जैसे सैकड़ों-हजारों लोग इस स्थति में होंगे.. जो मौत को अपनी आंखों के सामने तांडव करते देख रहे होंगे..


भारत में एक मजबूर शख्स किसी से मदद की गुहार लगाने के अलावा कर भी क्या सकता है? कई मरीज होंगे जिनके परिवार में कोई देखने वाला नहीं होगा.. और उनसे ये स्थितियां नहीं संभल रही होंगी.. क्या ऐसे लोगों की मौत का जिम्मेदार ये 'सिस्टम' नहीं होना चाहिए.. हुक्मरान कोरोना की दूसरी लहर को एक महीना से ज्यादा बीत जाने के बाद भी लोगों तक जरूरी मदद पहुंचाने में नाकाम ही नजर आ रहे हैं...

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