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"पगलैट" से सीखिए "कुछ क्रांतियां ख़ामोशी से भी हो सकती हैं"

"एक्ट्रेस सान्या" मल्होत्रा से सीखें रिजेक्शन से डील करना..

"पगलैट" से सीखिए "कुछ क्रांतियां ख़ामोशी से भी हो सकती हैं"

जिंदगी के संघर्ष ही हमें जिंदा होने का अहसास दिलाते हैं... तो जिंदगी में उतार-चढ़ाव लाजमी है.. और कई बार तो हम परेशानियों के सामने घुटने टेक ही देते हैं.. लेकिन जो हमसे बर्दाश्त नहीं होता वो है रिजेक्शन.. अब ‘पगलैट’ की एक्ट्रेस सान्या मल्होत्रा को ही ले लीजिए.. जिन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिल में खास जगह बना ली है..


6 साल पहले धर्मेश ने स्टूडियो से एक्टर सान्या मल्होत्रा को रिजेक्ट किया था.. लेकिन उन्होंने इस रिजेक्शन के मायने ही बदल दिए.. और उसी स्टूडियो में आकर सान्या ने अपनी फिल्म Pagglait का प्रमोशन किया.

सान्या ने कहा कि मेरी जिंदगी एक सर्कल की तरह है... सर्कल तो सबकी जिंदगी में होते हैं.. कुछ लोग उसको एक्सेप्ट करते हैं.. और कुछ लोग निराश होकर फुल स्टॉप लगा देते हैं.. लेकिन आगे वही लोग बढ़ पाते हैं जो सान्या की तरह होते हैं.. सान्या ने रिजेक्शन का सामना किया.. स्ट्रगल किया..  और अपने फिल्मी करियर की शुरुआत आमिर खान के साथ फिल्म दंगल से की.. और अपनी एक्टिंग के दम पर पहली फिल्म में ही सान्या ने अपनी अलग पहचान बना ली..


ये तो रही सान्या की बात... अब थोड़ी फिल्म पगलैट के बारे में भी बात कर लेते हैं..

मैं पहले पगलैट के उस एक सीन की बात करूंगी जिसने मेरे दिल को छू लिया.. इस सीन में पिता है, जो आर्थिक समस्या से जूझ रहा है, बेटे की तेरहवीं के लिए आने वाले सामान की लिस्ट बना रहा है. विधवा बहु दरवाज़े पर आती है हिसाब-किताब करवाने में साथ देने की बात कहकर वहीं ससुर के पीछे बैठ जाती है. ये सीन सुनने में जितना आम लग रहा है देखने में उतना रुला देने वाला है.. इस सीन की खासियत यही है कि आप इसे महसूस कर सकेंगे.. हालांकि दोनों के डायलॉग्स बहोत कम हैं..


हमारे समाज  में आज भी ये मानते हैं कि पति के मरने के बाद औरत का को यह मान लेना चाहिए कि अब उसका सब ख़त्म हो गया है... और अगर वो किसी से बात नहीं कर रही या सामान्य व्यवहार कर रही है, तो उसका दिमाग ख़राब हो चुका है'.. पगलैट में यही सब दिखाया है.. घरवालों की चिंता से लेकर मरे हुए पति के मन में उसके लिए कभी प्यार था इसकी खोज.. इस सब से जूझती हुई एक विधवा मिलेगी आपको..


मेरी मानिए तो 'पगलैट' बिना किसी शक के देखिए.. एक बेहतरीन फ़िल्म जो मुद्दे से भटके बिना 'विधवाओं' के अधिकार की बात कह जाती है...  अधिकार जो उन्हें दान में नहीं मिलने चाहिए क्योंकि वे उनके अपने हैं.

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