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हर तरफ बस गणतंत्र ही गणतंत्र दिख रहा है..

तो कल से देश के संविधान को बहत्तर साल पूरे हो गए हैं.. या कल के नजारे के बाद कह सकते हैं कि हमारा संविधान बहत्तर साल बुजुर्ग हो गया है..

हर तरफ बस गणतंत्र ही गणतंत्र दिख रहा है..


कल कुछ छोटे बच्चों को देखा जो झंडारोहण के बाद छोटी सी प्रभात फेरी निकाल रहे थे.. उस वक्त अपना बचपन याद आ गया था.. कैसे चार लड्डू से अपना गणतंत्र दिवस मन जाया करता था.. लेकिन बचपन तो बचपन ही होता है..खैर.. पिछले कई दिनों से सिंघु सीमा पर धरना दिए बैठे किसानों ने कल दिल्ली के भीतर ट्रैक्टर मार्च कर ही दिया.. समझा ही दिया कि अब हमारा संविधान बूढ़ा हो चला है.. और हर दूसरे आदमी की तरह हम भी यही कह रहे हैं कि सरकार क्या कर रही है..


खैर.. ट्रैक्टर परेड निकली.. और जो नहीं होना था वो हुआ.. किसानों ने लाल किले पर धावा बोल दिया.. अब पता नहीं कई लोग तो कह रहे हैं कि किसानों की आड़ में कोई और अपनी रोटियां सेंक गया.. इसी बीच एक युवक दौड़ा. उसने एक पोल पर चढ़कर खालसा पंथ और किसान संगठन का झंडा बांध दिया.. और मीडिया वाले एक नंबर के जाहिल.. जो भड़काने में लग गए.. एक बड़े न्यूज चैनल की बड़ी मोहतर्मा कह रहीं थीं कि उन्हें बहोत दुख हुआ.. क्योंकि तिरंगे की जगह खलिस्तान का झंडा फहरा दिया गया.. मतलब हद्द है.. उन मोहतर्मा को अब तक पता चल गया होगा कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था.. तिरंगा अपनी ही जगह लहरा रहा था.. खैर..


इतना ही नहीं दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में जमकर हिंसा हुई.. तलावर चले. लाठियां बरसीं. आंसू गैस के गोले दागे गए. सोशल मीडिया पर भी सनसनी मच गई. पक्ष-विपक्ष में दनादन पोस्ट आने लगे. कंगना ने भी हर बार की तरह सोशल मीडिया पर तीर चलाने लगीं.. बॉलीवुड कहां पीछे रहता है इस तरह के मुद्दों पर.. खासकर कंगना.. खैर आज इनपर बात करने का मूड नहीं है मेरा.. इनको किसी और दिन लताड़ेंगे.. अच्छे से..

वैसे आखिरी बार जो खबर पढ़ी और सुनी थी वो तो यही थी कि कृषि कानूनों को लेकर सरकार अपना स्टैंड क्लियर कर चुकी है.. और इन कानूनों को कुछ दिन के लिए ठंडे बस्ते में डालने की बात भी कर रही है.. फिर भी अगर सरकार किसानों को संतुष्ट नहीं कर पा रही है.. तो ये किसकी नाकामी है? किसानों की या सरकार और उसके तंत्र की.. जो जनता के प्रतिनिधि है.. उनका कर्तव्य है कि हर उस व्यक्ति की आवाज़ को तवज्जो दे जो असंतुष्ट है..


जय जवान जय किसान वाले हमारे देश में कल जवान और किसान दोनों एक दूसरे के आमने-सामने दिखे..

मुझे नहीं लगता कल के दिन देश की ये दुर्दशा किसी को भी अच्छी लग रही होगी.. देश अपना ,सरकार अपनी, किसान अपने सब कुछ तो अपना ही है.. गणतंत्र दिवस का मतलब ही यही है कि सभी तंत्र से पहले गण यानि जनता यानि हम है.. फिर भी राजपथ और लोकपथ में ये भेद इंडिया और भारत की तरह बना हुआ है..

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