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देवभूमि की ओर.. (last-Part) By- Mrinali Srivastava

वैसे तो 10 दिन मैं हिमाचल में थी.. लेकिन आपसे केवल 7 दिन की ही कहानी बताई है अबतक.. और इसके पहले वाले पार्ट में मैंने बता दिया था कि ये पार्ट आखिरी होगा.. कारण ये है कि हिमाचल के दर्शन केवल मैंने 7 दिन ही किए हैं.. बाकी समय मैंने घरवालों के साथ बिताया था.. जिसके बारे में आज आपको बताऊंगी..

पहले बताती हूं अपने रूटीन के बारे में.. तो हिमाचल में ठंड कितनी भी हो.. लेकिन वहां के लोग ये नियम फॉलो करते हैं कि खाना खाने से पहले नहाना जरूरी है.. और ये अच्छी बात भी है.. तो मैंने भी यही रूटीन घर पर रहकर फॉलो किया.. और हां भाईसाब चूल्हे के गर्म पानी से नहाने का मजा ही कुछ और होता है.. फिर क्या गीजर और क्या हीटर.. ठंड में जो खिलखिलाती धूप निकलती है वहां.. उसके सामने बैठकर नाश्ता करना.. और धूप सेकने के साथ-साथ चिड़ियों की चहचहाने की आवाज.. वाह भाई वाह.. मतलब जिंदगी हो तो ऐसी हो.. वरना न हो.. खैर.. ये सब आपको चिढ़ाने के लिए नहीं बता रही हूं.. बल्कि इसलिए बता रही हूं क्योंकि हिमाचल में 10 दिन मेरा यही रूटीन होता था..  

ऊपर तस्वीर देख रहे हैं.. ये मेरी ट्रैवेल पार्टनर है.. तो सुबह-सुबह रॉनिका की ऑनलाइन क्लासेस स्टार्ट हो जाती थी.. और वो अपनी मैम से कहती रहती थी कि "मैं अपनी नानी के घर पर आई हूं..प्लीज मुझे पढाओ मत" और क्लासेस के बीच वो पूरे घर में दौड़ती-खेलती रहती थी.. गाय से बाते करती थी.. फिर भाभी उसके पीछे भागती रहतीं थीं.. 

मुझे धीरे-धीरे इन सब चीजों की आदत पड़ने लगी थी.. जिस दिन कहीं नहीं जाना होता था.. मैं घर की छत पर चली जाया करती थी.. क्योंकि बताया था न कि भाभी के घर की छत से नजारे बेहद खूबसूरत दिखते थे.. तो छत पर जाकर आंखे सेंक लिया करती थी.. और कुछ तस्वीरें ले लिया करती थी.. इसी बीच कड़ाके की धूप के बीच एक ठंडी हवा का झोंका मानों मेरे कानों से कुछ कहकर निकलता था.. मानों कह रहा हो कि यहीं बस जा.. यही वो सुकून है जो दिल्ली की चकाचौंध में लोग ढूंढते हैं.. खैर..

अब बात खाने की करूंगी.. हिमाचल की हर डिश में एक अलग ही स्वाद होता था.. चाय की खुशबू अलग सी होती थी.. अचार में अलग सा स्वाद होता था.. बचपन में जैसा दादी बनाया करती थीं.. हां हां वही स्वाद जो कहीं खो गया है अब.. वहां पर पूड़ियां भी अलग तरीके से बनती हैं.. जैसी मैंने पहले कभी नहीं खाई थीं.. उन्हें शायद खमीरी पूड़ियां कहते हैं.. खैर.. और भी बहोत कुछ था वहां .. जो यूपी और दिल्ली में नहीं मिलता.. जैसे वहां का फल.. एक फल था जिसका नाम और स्वाद दोनों खट्टा था.. नहीं समझे? बताती हूं..

मतलब वो जो फल होता है, बाहर से पूरा संतरे जैसा दिखता है.. लेकिन अंदर से थोड़ा अलग सा होता है.. और स्वाद में काफी खट्टा होता है.. काफी मतलब काफी... तो भाभी ने मेरे लिए उस फल से एक डिश बनाई थी.. वीडियो ऊपर है.. इस डिश को धनिया, सरसों, नमक, हरी मिर्च और गुड़ डालकर बनाते है.. गुड़ इसलिए कि थोड़ा खट्टापन दूर हो जाए.. मुझे खट्टी चीजे पसंद नहीं.. लेकिन इसका स्वाद काफी अच्छा लगा.. मैंने बड़े चाव से पूरा खत्म किया..

और हां एक दिन तो मां-पापा जी ने घर में सत्यनारायण जी की कथा भी रखी थी.. तो उसकी तैयारी में सभी घर वाले लगे थे.. शाम को आस-पास के लोग पूजा में शामिल होने घर आने वाले थे.. और उनके लिए शाम को खाने की भी तैयारी की गई थी.. 

वैसे तो हिमाचल में सभी लोग पहाड़ी भाषा में ही बात करते हैं.. मुझे कुछ समझ नहीं आता था तो भाभी मुझे हिंदी में दोबारा बतातीं थीं.. पहले-दूसरे दिन तो सब कुछ सिर के ऊपर से निकला.. लेकिन तीसरे दिन से मुझे थोड़ी-थोड़ी पहाड़ी समझ में आने लगी थी.. और चौथे दिन से तो मैंने मानों पहाड़ी समझने में महारथ हासिल कर ली थी..मुझे सबकुछ समझ में आने लगा था.. एक बात तो है कि हिमाचल में रहकर मुझे वहां की हर चीज से लगाव होने लगा था.. मां जी के हाथ के बने खाने से.. गाय और उसके बच्चे से.. वहां की आड़ी-तेढ़ी सड़कों से, वहां की धूप से, मिट्टी के चूल्हे से और सबसे ज्यादा पहाड़ों से..

मैं जब भी हिमाचल दर्शन को निकलती.. मेन सड़क पर आते ही सुंदर पहाड़ दिखने लगते थे.. कार में बैठकर बस खूबसूरत वादियों को देखते हुआ कहां खो जाती थी पता ही नहीं लगता था.. वहां कि वादियां इतनी हसीन है कि कोई भी यहां आकर बस खो ही जाता है..मेरी नज़रें इन वादियों पर ऐसे टिकी रहती थीं जैसे आप अपनी पहली मोहब्बत को देखते हैं.. एकदम वैसे.. ऐसा अलग सा नशा था न इन वादियों में.. जैसे पीने वाले को कितना भी पिलाओ.. वो मना नहीं करता है.. वैसा ही मेरे साथ हो रहा था.. इन खूबसूरत नज़ारों को जितना भी देखूं.. मेरा मन नहीं भर रहा था.. मुझे इतनी खुशी और इतने सुकून का अहसास आखिरी बार कब हुआ था मुझे याद ही नहीं..

कार में मैं रहती थी.. लेकिन मेरे साथ हिमालय की चोटियां भी साथ-साथ चलती रहती थीं.. ऐसा लगता था कि इन पहाड़ों में एक पहाड़ मेरा भी है.. जो मेरा साथ नहीं छोड़ रहा है.. और कुछ कहने की कोशिश कर रहा है..

भाभी का घर पालमपुर में है.. और पालमपुर चाय के बागानों के लिए जाना जाता है.. ये बात मैं आपको पहले भी बता चुकी हूं.. यहां की कांगड़ा चाय भारत ही नहीं पूरी दुनिया में फेमस है.. हमने चाय के बगानों को भी काफी नजदीक से देखा.. उसकी खुशबू काफी करीब से महसूस कर पाई थी मैं.. कुल मिलाकर अगर मैं देवभूमि के बारे में लिखने बैठूंगी तो पूरा दिन निकल जाएगा.. और ये आर्टिकल भी काफी बड़ा हो जाएगा.. क्योंकि देवभूमि की तारीफ में जितना कहो कम है.. इसलिए फिलहाल इस सीरीज "देवभूमि की ओर..' को यहीं विराम देती हूं..  

इन 10 दिनों में हिमाचल ने मुझे बहोत प्यार और अपनापन दिया.. इतना कि जब मेरे वापस आने का वक्त आया.. और मुझे अहसास हुआ कि अब जाना है.. मैं बहोत जोर से रोई.. इतना तो मैं अपने खुद के घर से निकलते वक्त नहीं रोती.. तो हिमाचल ऐसा ही है जनाब.. आपको अपना बना लेगा.. तो मैं निकल चुकी थी हिमाचल से.. रोते-रोते.. पहाड़ों को ताकते-ताकते.. उनसे बाते करते-करते.. और बस दिमाग में यही चल रहा था कि इस सुकून को छोड़कर क्यों जा रही हूं.. फिर से उसी भीड़-भाड़ और प्रदूषण से भरे माहौल की तरफ..

आखिरी में मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि मैं बेहद शुक्रगुजार हूं कि मेरा कोई अपना है जो हिमाचल का है... मैं शुक्रिया करना चाहूंगी मेरी भाभी का.. जिन्होंने मुझे ये मौका दिया.. और उनके परिवार का.. जो अब मेरा भी परिवार है.. उन्होंने मुझे बेहद प्यार दिया.. अगर आप मेरी भाभी से जुड़ना चाहें..या..हिमाचल के बारे में कुछ जानना चाहें.. तो आप उनसे फेसबुक के जरिए जुड़ सकते हैं.. रुपाली शर्मा श्रीवास्तव नाम से फेसबुक पर मिलेंगी... आप उनके ब्लॉग भी पढ़ सकते हैं.. जिसमें कुछ पहाड़ी कहानियां भी हैं..


आशा करती हूं कि आपको इस सीरीज.. इस सीजन के सारे पार्ट अच्छे लगे होंगे.. और मैं वादा तो नहीं कर सकती लेकिन इतना कह सकती हूं कि आपके लिए दूसरा सीजन जरूर लेकर आऊंगी.. वो सीजन इससे भी इंटरेस्टिंग होगा..


शुक्रिया.. मेरे साथ..और देवभूमि की ओर.. के साथ जुड़े रहने के लिए..

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