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चलो कम से कम "समाज" और "सियासत" में "संवेदना" अभी भी जिंदा है..

"समाज" और "सियासत" में "संवेदना" जीवित है..

सोशल मीडिया में आज जितनी पॉवर है उसकी तुलना किससे होगी मुझे नहीं मालूम.. मुझे बस इतना कहना है कि "बाबा का ढाबा" जो सोशल मीडिया की बदौलत ट्विटर पर टॉप ट्रेंड पर है.. वो काबिल-ए-तारीफ है.. जबकि 80 साल के कांता प्रसाद और उनकी 75 साल की पत्नी बदामी देवी को उनकी दुकान 'बाबा का ढाबा' के ट्विटर पर टॉप ट्रेंड करने से कोई फर्क नहीं पड़ता.. उनके लिए इसके क्या मायने..


इतनी सिंपल लाइफ.. एक छोटी सी दुकान, जहां ये बुजुर्ग दंपति अपने ग्राहकों को रोटी-सब्जी खिलाकर गुजरा कर रहे थे, अचानक एक दिन राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए.. वैसे तो कोरोना वायरस के दौर में "बाबा की ढाबा" जैसी कई दुकानें कराह रही हैं.. क्यों? ये समझना बेहद आसान है.. दिल्ली में "बाबा का ढाबा" जैसी खाने-पीने की दुकानों के ज्यादातर ग्राहक वो प्रवासी थे.. जो कोरोना के आने के बाद.. और अचानक से लॉकडाउन लगने के बाद.. या तो अपने घरों को लौट गए.. या फिर कोरोना के डर से अपने घरों में दुबके रहने को मजबूर हैं...


वैसे इसे एक पहल ही समझ लीजिए.. देर तो हो गई है.. ये काम काफी पहले  हो जाना चाहिए था.. मीडिया ने बाबा का ढाबा को जैसी कवरेज दी.. ऐसी कवरेज के लिए दिल्ली में और भी ढाबे वाले तरस रहे हैं.. उनको भी अपनी सब्जी दिखाकर "आज पूरा देश हमारे साथ है" जैसी बाइट देने का मौका मिलना चाहिए.. और एक बात तो साबित हो ही गई है  कि समाज और सियासत में संवेदना जीवित है..


कांता प्रसाद और उनकी पत्नी की जिंदगी तबब पलटी जब मालवीय नगर इलाके के विधायक और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता सोमनाथ भारती "बाबा का ढाबा" पहुंचे.. और उसी वक्त कांता प्रसाद की आंखों में उन्होंने शायद दर्द को महसूस कर लिया था.. कांता प्रसाद ने बताया कि कई दिनों से ढाबे पर कोई ग्राहक नहीं आया था.. रोज खाना बनाकर लाते थे, जो खराब हो रहा था.. फिर क्या.. भला हो सोमनाथ भारती और उनकी टीम का.. जो उन्होंने ढाबे पर हुई सारी बात अपने फोन पर रिकॉर्ड कर ली..


अब सोमनाथ भारती का सोशल मीडिया पर नेटवर्क तो तगड़ा है.. देखते ही देखते "बाबा का ढाबा" का वीडियो वायरल हो गया.. फिर क्या.. लोग बाबा का ढाबा की ओर रुख करने लगे.. अपनी 80 साल की जिंदगी में कांता प्रसाद ने नेता तो कई देखे होंगे.. लेकिन उनको कोसा ही होगा.. पर आज  वो नेतागिरी को कोसने के बजाए दुआएं दे रहे होंगे.. खैर.. अब तो दोनों पति-पत्नी बिजी हो गए हैं.. बाबा का ढाबा में अब ग्राहकों की कमी नहीं है..


इस वाक्ये ने लेकिन मुझे रानू मंडल की याद दिला दी.. उनका भी कुछ इसी तरह रेलवे स्टेशन पर गाना गाकर भीख मांगते हुए वीडियो वायरल हुआ था.. और फिर थोड़े समय के लिए ही सही, उनकी जिंदगी बदल गई..

मेरा बस यही कहना है कि ऐसे "बाबा का ढाबा" एक नहीं.. कई हैं.. जो कोरोना और लॉकडाउन के चलते दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं.. और ये परेशानी केवल खाने-पीने की दुकान चलाने वालों तक ही सीमित नहीं है.. ऐसी कई दुकाने हैं, जिनको ग्राहक नहीं मिल रहे हैं.. काम नहीं मिल रहा है.. जैसी संवेदना सोमनाथ भारती ने दिखाई है, उसी भाव से क्या देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले नेता सड़कों पर निकलेंगे? क्या वो उनके लिए मार्केटिंग करेंगे?



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