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सदियां बीत जाएंगी हमारे "समाज" को "मसाबा-मसाबा" स्वीकार करने में..

सदियां बीत जाएंगी हमारे "समाज" को "मसाबा-मसाबा" स्वीकार करने में..

मसाबा-मसाबा देखकर मुझे बस यही फील हुआ कि.. नहीं यार.. रियल लाइफ में ऐसा नहीं होता.. फिल्म अच्छी है.. बाकी स्त्री की आर्थिक और आत्मिक स्वतंत्रता पर अच्छी सीरीज है..


लेकिन यार सच बताऊं.. इतनी क्लियर ज़िन्दगी पेज 3 वालों को.. या फिर बेहद अमीर परिवार वालों को ही नसीब होती है.. और नहीं तो क्या.. बताइए ऐसा होता है कहीं.. कि कोई अचानक एक दिन अपना तलाक़ इंस्टाग्राम पर एनाउंस कर दें.. और उनसे कोई सवाल तक ना करे.. ये बात साबित करती है कि इन वेब सीरीज की कहानियों से  काफी अलग-थलग होती है रियल लाइफ की  लड़कियों की कहानी..


अब इतना "रियल लाइफ" के बारे में बात कर ही रही हूं.. तो पूरा आर्टिकल पढ़िए और समझिए कि ऐसा क्यों कह रहे हैं..


अगर हम रियल लाइफ की बात करें तो हमारे यहां जब लड़की ससुराल से घर लौटकर आती है.. तो मां चिंतित हो उठती है.. बेटी के मायके आने पर मांएं भांप लेती हैं.. कि बेटी ख़ुश होकर चंद दिन रहने आई है.. या ससुराल में लड़कर वापस ना लौटने का मन बनाकर.. और उसके बाद शुरू होता है पारिवारिक ट्रायल पीरियड.. माता-पिता, भाई-बहन के अलावा, पड़ोसी, रिश्तेदार यहां तक की दोस्त भी इस बात को हज़म नहीं कर पाते.. 


और सवाल भी देखिए कैसे-कैसे आपके सामने आते हैं.. कि जब ससुराल में कोई मारता पीटता नहीं.. पैसे की कोई कमी नहीं.. तो फ़िर तुम नाख़ुश क्यों हो?'.. 'तलाक़ लोगी तो लोग क्या कहेंगे?'.. आजकल कुंवारियों को तो अच्छे लड़के मिलते नहीं.. तो तलाक़शुदा को कहां से मिलेगा'.. दबे-छुपे यह भी बात कही जाने लगती है कि, 'लड़की वापस ना लौटने के लिए आई हो तो मायके में भी बोझ बन जाती है..' 


लेकिन इन सभी सवालों के बीच एक बेहद कॉमन सा सवाल छूट जाता है.. वो ये.. कि कोई उस वापस घर आई लड़की से ये नहीं पूछता कि आखिर वो नाख़ुश क्यों है? किसी रिश्ते में ख़ुशी के लिए उसकी जो परिभाषा है, उम्मीदें हैं वे अलग क्यों हैं?


अब बात रियल लाइफ की कर रहे हैं तो बता दूं कि हमारे यहां बेटियों को बढ़ा ही ये बोलकर किया जाता है कि "ससुराल जाओगी तो नाक कटाओगी".."खाना बनाना सीख लो नहीं तो सास कहेगी मां ने कुछ नहीं सिखाया" अब सोचिए कि ये सब बोलने वाले लोग.. इन लोगों को क्या पता कि मानसिक अशांति भी किसी शादी को तोड़ने के लिए वजह बन सकती है.. 


और अगर लड़की बताएगी भी कि वो किस तरह से अपनी शादी में मानसिक पीड़ा सहन कर रही है.. तो उसे उसकी मां कुछ चुनिंदा बाते बोलकर चुप करा देंगी.. जैसे..


"लड़कियों को शादी में थोड़ा कॉम्प्रोमाईज़ तो करना ही पड़ता है, झुक कर रहना पड़ता है.. कुछ इच्छाएं मारनी पड़ती हैं, तुम कहां की अलग हो, वापस नहीं जाओगी तो क्या करोगी.. लोग क्या कहेंगे..?, 10-12 हज़ार की नौकरी में गुज़ारा कर लोगी?, केवल अपने बारे में सोच रही हो क्या"  ये सब बोलकर और फिर उस लड़की को वापस भेज दिया जाता है.. जहां बेमन से, डिप्रेशन के साथ उसने अपना जीवन गुज़ारना पड़ता है..


हम तो ऐसी सोसायटी में रहते हैं जहां "तलाक़" शब्द सुनकर आज भी घरवालों को करेंट लग जाता है.. अभी तो ये लोग "थप्पड़" देखकर ये ही स्वीकार नहीं कर पाए कि "एक थप्पड़ की वजह से तलाक़ कौन लेता है" फिर तो मसाबा जैसा जीवन स्वीकार करने में तो सदियां गुजर जाएंगी.. मसाबा की तरह एक अलग घर लेकर अपनी ज़िन्दगी शुरू करने का सपना हमारी लड़कियां कहां देख पाती हैं..


अगर आपने मसाबा-मसाबा देख ली है.. या फिर देखने वाले हैं.. तो इस फ़िल्म से कुछ और सीखिए या न सीखिए.. लेकिन एक बीत जरूर सीखिएगा कि आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना पहले चुनिए.. आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं.. तो आपको वो शक्ति मिलती है जो आपके नाम में लगे 'केयर ऑफ' को हटाकर आपकी अपनी नेम प्लेट तक ले जाए..


कुल मिलाकर मसाबा एक अच्छी फ़िल्म है.. जो औरत के लिए बने काफ़ी सारे बेरियर तोड़ती दिखती है.. लेकिन हमारा समाज इससे कुछ सीखेगा.. ऐसी उम्मीद करना बेमानी है.. 

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