खास आपके लिए

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"मां" आप आज भी मेरी "अलार्म क्लॉक" हो..

"मां" आप आज भी मेरी "अलार्म क्लॉक" हो..

हमारे घर में अलार्म क्लॉक नहीं थी.. रही भी होगी तो मुझे कुछ खास याद नहीं.. और मोबाइल फोन पर हम ज्यादा खुराफात करते नहीं थे.. क्योंकि उस वक्त फोन केवल पापा के पास हुआ करता था.. और शेर के मुंह में हाथ डालने की हिम्मत नहीं थी मुझमें..

लेकिन मुझे याद है कि अलार्म क्लॉक की कमी हमें कभी महसूस नहीं हुई.. क्योंकि उस वक्त हमारी मां ही हमारा अलार्म क्लॉक हुआ करती थीं.. और उसमें Dismiss का ऑप्शन नहीं हुआ करता था.. केवल Snooze का ऑप्शन होता था.. Exam के टाइम में तो ये अलार्म अलग ही रूप में आ जाता था.. Exam अगर गर्मी में होते थे तो पंखा बंद कर दिया जाता था.. ठंड में होते थे तो रजाई छीन ली जाती थी..


और हां.. रात को मां से बोल के सोते थे कि 4 बजे सुबह पढ़ने के लिए जगा देना.. तो वो हमेशा 3:55 पर ही आकर जगा देतीं थीं.. ताकि कोई मक्कारी न चल पाए..

पढाई करने के लिए हमें हमारा अलार्म उठा देता था.. फिर जैसा कि मैंने बताया कि केवल Snooze का ऑप्शन हुआ करता था.. और वो कुछ ऐसे काम करता था.. मां बीच-बीच में चेक करने आती थीं, कि हम पढ़ाई कर रहे हैं या नहीं.. कर रहे होते थे तो ठीक.. नहीं कर रहे होते थे तो उनका अलार्म बजने लगता था.. पढ़ोगे नहीं तो फेल हो जाओगे.. फेल हो गए तो पापा से मार पड़ेगी.. और दोस्तों को क्या मुंह दिखाओगे..


मैं अगर अपनी बात करूं तो ये मां रूपी अलार्म केवल बचपन तक ही सीमित नहीं था.. जब मैं बड़ी हो गई.. समझदार हो गई.. मोबाइल हाथ में आ चुका था.. तब भी मैंने मोबाइल फोन के अलार्म का सहारा नहीं लिया.. मेरा भरोसा तब भी मेरे अपने जन्म सिद्ध अधिकार वाले अलार्म पर ही रहा.. अपने पोस्ट ग्रेजुएशन के Exam के वक्त मैं मां को रात को फोन कर के सोती थी.. कि सुबह इतने बजे Exam है तो इतने बजे उठा देना.. और हमेशा की तरह 5 मिनट पहले ही उनका फोन आ जाता था.. उस वक्त मैं उनसे दूर रहती थी फिर भी..


मेरे लिए मां केवल मेरे Exam के वक्त की अलार्म नहीं रही.. मेरे लिए तो मेरी जिंदगी का अलार्म रही हैं मां.. और सबकी मां भी ऐसी ही होती हैं.. मतलब अगर मां को मेरा कोई काम गलत लगा.. तो उनका अलार्म बजने लगता है.. आज भी.. या फिर मेरा कौन सा दोस्त सही है और कौन गलत.. इसके बारे में भी उनका अलार्म पहले ही बजने लगता था.. उस वक्त तो बुरा लगता था.. लेकिन बाद में समझ आता था कि मां सही थीं.. आज भी अगर कोई काम होता है तो उनसे सलाह लेती हूं.. तो उनका अलार्म बजने लगता है..


मैं सोच रही थी कि अब की या आने वाली जेनरेशन को क्या इस मां रूपी अलार्म का सुख मिल पाएगा.. सबकुछ डिजिटल है.. फोन और अलार्म घड़ी पर सभी इतना निर्भर हैं.. बचपन से ही बच्चों के हाथ में फोन थमा दिया जाता  है.. मशीनों पर इतनी डिपेंडेंसी है कि हमारे बच्चे शायद ही वो सुख ले पाएं.. और इसकी वजह से वो कभी ये भी नहीं जान पाएंगे कि मां रूपी अलार्म जैसी भी कोई चीज होती थी.. खैर..


मां एक ऐसा अलार्म है जो Snooze तो हो जाएगा.. लेकिन कभी Dismiss नहीं होगा.. आज हम भले ही अपने पैरेंट्स से दूर रहते हों.. लेकिन हमारे लिए आज भी सबसे भरोसेमंद अलार्म वहीं हैं.. और मैं तो यही चाहती हूं कि ये अलार्म हमेशा मेरे साथ रहे.. और समय-समय पर बजता रहे..

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