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शिवसेना और बीजेपी की राजनीतिक जंग में कंगना मात्र एक मोहरा हैं !

शिवसेना और बीजेपी की राजनीतिक जंग में कंगना मात्र एक मोहरा हैं !

जब कंगना चंडीगढ़ से मुंबई एयरपोर्ट आईं थीं.. तब वहां कौन था?..वहां कौन था? उनके समर्थन में रामदास अठावले की पार्टी RPI के कार्यकर्ता थे.. और वहां कौन था? विरोध में शिवसेना समर्थक कामगार यूनियन के लोग थे.. वहां और कौन था ? कंगना की फेवरेट पार्टी के लोग कहां थे ?

(इसे रसोड़े में कौन था के तर्ज पर पढ़ सकते हैं.. आप चाहें तो.. )

शुरुआत से ही आपने देखा होगा कि कंगना रनौत सोशल मीडिया पर फ्रंटफुट से आगे बढ़कर खेल रही हैं.. कंगना ने अपने ट्वीट पर लिखा भी था कि- "I have not only risked my career but also my life" अब लोग कह रहे हैं कि कंगना रनौत में इतनी हिम्मत आयी कहां से? मतलब बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के तो कंगना रनौत के लिए भी ये सब मुश्किल है.. 


लेकिन अब इतना कुछ होने के बाद और इस मोड़ पर आकर असलियत साफ दिखती है.. कि शिवसेना और बीजेपी की राजनीतिक जंग में कंगना रनौत केवल एक मोहरा बन कर रह गयीं हैं.. और तो और कंगना रनौत के मामले में बीएमसी ने तो हद ही पार कर दी.. इतनी ज्यादा ही हड़बड़ी दिखा दी.. नहीं दिखायी होती तो मणिकर्णिका फिल्म का दफ्तर अपनी जगह यूं ही बना हुआ होता.. लेकिन भाईसाब.. इतिहास गवाह है कि बदले भी भावना से किसी का भला नहीं हुआ..


वैसे एक बात तो है.. कहीं न कहीं बीएमसी को भी ये मालूम रहा ही होगा.. कि मामला अदालत पहुंचा तो उसकी जेसीबी पर हाईकोर्ट का हथौड़ा चल जाएगा.. और ऐसा भी नहीं है कि बीएमसी ने पहली बार किसी बॉलीवुड स्टार के खिलाफ ऐसी सख्ती दिखाई है.. शाहरूख खान से लेकर कपिल शर्मा जैसी हस्तियां भी बीएमसी के निशाने पर आ चुकी हैं.. लेकिन 24 घंटे में तोड़फोड़ करने वाली नौबत नहीं आई थी.. ऐसी जल्दी तो केवल बीएमसी ने कंगना रनौत के मामले में दिखायी है.. वो भी पहली बार..


और हमारे नॉटी नेता लोग कह रहे थे कि अगर कोई कानून तोड़ता है, तो उसके खिलाफ एक्शन लिया जाता है.. खैर


कंगना की बातों से तो ऐसा लगता है जैसे उन्होंने पहले से ही लड़ाई का मन बना लिया था.. अब तक किसी ने शिवसेना को कंगना की तरह चैलेंज नहीं किया है.. नहीं तो एक जमाना वो था जब फिल्मों की रिलीज को लेकर बड़े-बड़े कलाकारों को दरबार में हाजिरी लगानी पड़ती थी.. लेकिन कंगना रनौत ने तो उस गुरूर को ही चुनौती दे डाली..


कंगना रनौत ने तो लोगों को अयोध्या से कश्मीर तक की याद दिला दी.. कंगना ने अपने घर को तोड़ने की कार्रवाई को कश्मीरी पंडितों के साथ हुए व्यवहार से जोड़ दिया.. और कहा कि अयोध्या के साथ ही साथ अब वो कश्मीर पर भी फिल्म बनाएंगी.. जिसका सारा फोकस कश्मीरी पंडितो पर हुए अत्याचार पर होगा.. और तो और कंगना ने मणिकर्णिका फिल्म के ऑफिस को राम मंदिर बताया है और शिवसेना को बाबर.. और ऐलान किया है कि मंदिर फिर बनेगा - जय श्रीराम.


लेकिन एक बात तो है.. इन दोनों की इस लड़ाई में हर पक्ष फायदे में है सिवाए महाराष्ट्र की जनता के.. वो तो कोरोना से आयी मुसीबतों से वैसे ही जूझ रहे हैं.. जैसे पहले जूझ रहे थे.. पुणे और कोल्हापुर जैसी जगहों में तो कोरोना के मामले तेजी से बढ़ते देखे जा रहे हैं.. 


बाकी फायदे की बात करें तो कंगना रनौत के बहाने शिवसेना को फायदा ये मिल रहा है.. कि वो मुंबई गौरव, मराठी मानुष, महाराष्ट्र की अस्मिता और शिवाजी के नाम पर बीजेपी विरोधियों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है.. और इस मुद्दे पर एनसीपी और महाराष्ट्र कांग्रेस शिवसेना का साथ दे रही है.. उधर कंगना रनौत ने अपने ऑफिस को राम मंदिर बताकर अयोध्या से जुड़ी धार्मिक भावनाओं और कश्मीर के साथ राष्टवाद से जोड़कर उन लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की है जो बीजेपी को सपोर्ट करते हैं.. 


बड़ी बात तो यही है कि शिवसेना के खिलाफ बीजेपी को ऐसे ही किसी मुद्दे की जरूरत है.. जिसकी बदौलत वो मराठी मानुष और मराठी अस्मिता में फंसे बगैर शिवसेना को कठघरे में खड़ा कर सके.. क्योंकि बिहार के बाद बीजेपी का अगला एजेंडा महाराष्ट्र सरकार ही तो है..


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