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मीडिया संस्थानों का मनमाना रवैया नया नहीं है

मीडिया संस्थानों का मनमाना रवैया नया नहीं है

कोरोना तो बस एक बहाना है.. मीडिया का ये मनमाना रवैया तो हमेशा से ऐसा ही था..

प्रधानमंत्री जी ने कुछ कहा था तो क्या हुआ.. तो क्या हुआ अगर उन्होंने कहा था 'पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों की तरह मीडिया की भी इस महामारी से लड़ने में अहम भूमिका होगी.. क्या प्रधानमंत्री और क्या उनकी बातें..उनकी बातों को कौन सीरियसली लेता है.. मीडिया संस्थानों को तो जो करना है करेंगी ही.. तो क्या हुआ अगर आज दूसरों की नौकरी और रोज़ी-रोटी को लेकर बात करने वाले पत्रकारों का भविष्य खुद खतरे में है तो.

इसमें कुछ नया नहीं है लेकिन.. असलियत में हमेशा से ही पत्रकार डर-डर के नौकरी करता रहा है.. मालिक की हां में हां मिलाओ.. नहीं तो नौकरी से जाओ.. आप भले ही अपने 5-10 साल किसी मीडिया संस्थान को दे दें.. लेकिन जरा सी बात पे आपकी नौकरी खाने में उन्हे एक मिनट का भी समय नहीं लगेगा..

फिर इस बार तो इन मीडिया संस्थानों को महामारी का बहाना मिल गया.. बड़ी पोस्ट पर बैठे लोगों ने सिर्फ़ तीन हफ़्तों के लॉकडाउन के बाद ही महामारी को लोगों की नौकरियां छीनने का बहाना बना लिया.. मेरे कई मीडिया के साथी हैं जिनसे बात होती है तो पता चलता है कि उनके पास नौकरी नहीं रही अब.. किसी ने 3-4 महीने से सैलरी न मिलने की वजह से खुद छोड़ दिया.. तो किसी से महामारी का नाम देकर इस्तीफा मांग लिया गया..

मीडिया संस्थानों में बड़े पद पर बैठे लोगों को अपनी नौकरी कैसे बचानी है ये बेहद अच्छे से आता है.. अथाह इंटर्न्स को भर लेंगे.. सिखाएंगे कम.. लेकिन निचोड़ पूरा लेंगे.. और जब पेड करने की बात आएगी तो इंटर्नशिप लेटर थमा देंगे.. और गलती से अगर पेड कर दिया.. तो 9 की जगह 12 घंटे काम करवाएंगे.. और अब तो मीडिया संसथान मौके का पूरा फायदा उठा रहे हैं.. सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर 1 आदमी से 10 आदमियों का काम करवाया रहे हैं.

वैसे तो मीडिया में नौकरी जाने की शुरुआत लॉकडाउन के कुछ समय बाद ही हो गई थी.. अलग-अलग संस्थानों से बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला जाने लगा था.. और ये सिलसिला अब तक जारी है.

"बीबीसी की एक खबर के मुताबिक" हाल ही में ‘हिंदुस्तान’ का एक सप्लीमेंट ‘स्मार्ट’ बंद हुआ है. इस सप्लीमेंट में क़रीब 13 लोगों की टीम काम करती थी.. जिनमें से 8 लोगों को कुछ दिनों पहले इस्तीफ़ा देने के लिए बोल दिया गया.. राजस्थान पत्रिका के नोएडा ऑफिस से भी लोगों को टर्मिनेशन लेटर दे दिया गया है.. उन्हें जो पत्र मिला है उसमें दो या एक महीने का वेतन देने का भी ज़िक्र नहीं है.. सिर्फ़ बक़ाया लेने के लिए कहा गया है.. हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में भी पत्रकार से लेकर फ़ोटोग्राफ़र तक की नौकरियों पर संकट आ गया है.. 'द क्विंट' न्यूज़ वेबसाइट ने अपने 200 लोगों की टीम में से क़रीब 45 को 'फ़र्लो' यानी बिना वेतन की छुट्टियों पर जाने को कह दिया है. 

दिल्ली-एनसीआर से चलने वाले न्यूज़ चैनल 'न्यूज़ नेशन' ने 16 लोगों की अंग्रेज़ी डिजिटल की पूरी टीम को नौकरी से निकाल दिया.. टाइम्स ग्रुप में ना सिर्फ़ लोग निकाले गए हैं, बल्कि कई विभागों में छह महीनों के लिए वेतन में 10 से 30 प्रतिशत की कटौती भी गई है.. इसी तरह नेटवर्क18 में भी जिन लोगों का वेतन 7.5 लाख रुपये से ज्यादा है, उनके वेतन में 10 प्रतिशत की कटौती हुई है.. मीडिया संस्थान बेधड़क अपने कर्मचारियों से इस्तीफा ले रहे हैं.. और कई जगह तो पत्रकारों का ये भी आरोप है कि उन्हें नौकरी से निकालने का ठोस कारण भी नहीं बताया गया. अगर कंपनी घाटे में है तो उन्हें ही क्यों चुना गया.

पत्रकारों पर तो मानों दोहरी मार पड़ी है.. एक तो लॉकडाउन में नौकरी चली जाना.. और दूसरा इस कोरोना काल में किसी दूसरे संस्थान में नौकरी भी मिलना मुश्किल है..


3 comments:

  1. media me ye sab hona koi nai bat nhi har june july me logo ki job chle jate hai. koi 6 month tak khale rhta h to koi 3 month tak.

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