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लॉकडाउन में "मां-पापा" के नाम एक खत

लॉकडाउन में मां-पापा के नाम एक खत

डियर मां-पापा,

मेरे अलावा केवल आप ही समझते हैं कि मेरा ये समय कैसे कट रहा होगा, जबकि आपसे बहोत दूर हूं. मेरा आपके पास आने का मन भी हो रहा है. आप दोनों वहां अकेले हैं, और मुझे वहां होना चाहिए था आपका ख्याल रखने के लिए. खासकर इस भयानक समय में.

मां, मेरे दिमाग में बहोत सारी चीजें घूमती रहती है. उनमें से कुछ आप दोनों से जुड़ी होती हैं. जो मैं आपको बताना चाहती हूं. मै इस दुनिया में सबसे ज्यादा आपसे प्यार करती हूं. और आप दोनों के लिए बहोत कुछ करना चाहती हूं. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मैं बहोत कुछ पीछे छोड़ आई हूं. कहीं वो रह तो नहीं जाएंगी. 

अब इस माहौल में लगता है कि वो सब जो मैंने सोचा था, वो करने का मौका मिलेगा भी या नहीं. आप दोनों ने मुझे कभी हारना नहीं सिखाया. लेकिन इस कोरोना काल में अगर मुझे कुछ हो गया तो मैं हार जाउंगी. जिंदगी से भी. और उन सारी चीजों से भी जो मैंने सोची थीं लेकिन कर नहीं पाई.

और अब सोचती हूं कि क्यों नहीं की वो चीजे. कौन से सही वक्त का इंतजार कर रही थी मैं. और अब पता नहीं वो सही वक्त आएगा भी या  नहीं, लेकिन मां मुझे नहीं पता था कि कभी ऐसा समय भी आएगा. जब हम घरों में कैद हो जाएंगे. जब वक्त तो गुजरेगा. लेकिन हम एक जगह ठहर जाएंगे.

आपको तो पता ही है. कि आपकी डांट हो या फिर पापा का बेवजह गुस्सा. मैं कुछ भूलती नहीं. जैसे बचपन में कोई परेशानी मुझतक आने से पहले आप तक आती थी. और जब मुझे चोट लगती या डर लगता तो मैं आपके पास आती थी. फिर आप मुझे छूमंतर कर के सारी परेशानियों से निकाल लेती. मां आज फिर से परेशानियां हैं. और मन करता है अभी आ जाऊ दौड़कर आपके पास. और तब मेरा कोरोना भी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.

लेकिन फिर अचानक से याद आता है कि नहीं. असल में तो ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता. जैसे कोई सपना सा टूट जाता हो. फिर भी किसी अच्छी खबर की आस में दिमाग कुछ और सोचने लगता है. और ये रोज की कहानी है.


मां इस लॉकडाउन की शायद ही कोई रात हो जब मैंने आपके और पापा के बारे में न सोचा हो. और मुझे ये अहसास न हुआ हो कि कुछ चीजें मैं बिल्कुल वैसे ही भूल गई थी. जैसे आप पापा की किसी बहोत जरूरी चीज को अलमारी में इतना सुरक्षित रख देती थी, कि आपको भी याद नहीं रहता था कि कहां रखी. बस वैसे ही मैं भी कहीं रखकर भूल गई थी.

और अब इस लॉकडाउन ने दोबारा उन खोई हुई बातों को याद दिलाया है. बिल्कुल वैसे ही जैसे हम बचपन में किसी सबसे खास किताब या अपनी पर्सनल डायरी में गुलाब का फूल रख देते थे. और कुछ वक्त बाद वो सूखा हुआ फूल हमें दोबारा दिखता था. और उस वक्त की सारी बातें याद आ जाती थीं. 

मां, जैसे पूरी दुनिया यही उम्मीद कर रही. मैं भी बस अब इसी उम्मीद में हूं कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा. लेकिन कहीं न कहीं मन में डर भी है कि आखिर कब तक. और ये जो भयानक वक्त अभी चल रहा है. इसमें कौन जीतेगा और कौन नहीं. 

लेकिन मां एक मौका मुझे भी चाहिए. आप दोनों के लिए.

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