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तुम मजदूर थे.. हो.. और.. रहोगे.. हमारे स्टेटस को तुम्हारी कोई जरूरत नहीं..

तुम मजदूर थे.. हो.. और.. रहोगे.. हमारे स्टेटस में तुम्हारी कोई जगह नहीं है..

देश में कोरोना के मरीजों की संख्या के साथ-साथ सवालों की गिनती भी बढ़ती जा रही हैं.. अपने पिछले पोस्ट "सिस्टम से मेरे कुछ सवाल" में मैंने कुछ सवाल किए थे.. वो तो कहीं दब ही गए.. नए सवालों के भार तले..

आपको भी शायद कभी-कभी लगता होगा कि देश में ये क्या मजाक चल रहा है.. कोई कह रहा मजदूरों को रेल का किराया देना होगा, कोई कह रहा रेल किराया हम उठाएंगे, कोई कह रहा हम मजदूरों के लिए हजार बसें भेज रहे हैं. कोई कह रहा बस की जगह स्कूटर भेजे हैं. कोई कह रहा है आप उन बसों पर अपना झंडा लगवा दीजिए. कोई कह रहा है आप प्रूफ दीजिये. सत्ता को चमकाने के लिए में रोटियां फूले नहीं फूल रहीं इनकी.

साहब.. एक बार खुद को उन मजदूरों की जगह रख के देखिए.. जो परोपकार के नाम पर खेल आप खेल रहे हैं.. उनको कितनी तकलीफ हो रही होगी.. लेकिन नहीं.. आप तो केवल सत्ता का शहद चाटने के चक्कर में लगे हैं..

आपके लिए तो उनकी कीमत मात्र एक वोट भर की ही है.. अब उनकी कीमत का पता इसी से लगा लीजिए कि आपका ईगो उन मजदूरों की मजबूरी पर भारी पड़ गया.. साहब.. आत्मनिर्भर तो ये मजदूर सालों से ही हैं.. इतने की जहां मजदूरी करते हैं वहीं बसेरा बनाते हैं.. हां बस आपकी नजरों को आज दिख रहे हैं.. इसीलिए उनके ऊपर आज कविताएं ही लिखी जा रही हैं.. या फिर कहें कि ये नए समाज का आगमन है. दस्तक मात्र है..

दूसरी तरफ ऐसा लगता है मानों हमारे देश का संविधान हमारे प्रवासी मजदूरों को मुंह चिढ़ा रहा हो.. कोरोना वायरस, हमारा देश और प्रवासी मजदूर.. इन तीनों की आपस में कभी बन ही नहीं पाई.. और हर दूसरी तस्वीर बयां करती है कि भरपाई कौन कर रहा है.. लेकिन आपको हमारे देश का हर दूसरा नेता संविधान की दुहाई देते हुए दिख जाएगा.. जमीनी स्तर पर झांक कर देखना तो इन लोगों की शपथ में शामिल नहीं था न.. खैर....

आप, हम, हमारा देश और हमारे मजदूर इस वक्त बहुत बड़ी सच्चाई का सामना कर रहे हैं.. और वो कहते हैं न कि सच तो कड़वा ही होता है.. लेकिन सच जानलेवा जहर भी होगा.. ये अब मालूम चल गया है.. और ऐसा नहीं है कि प्रवासी मजदूरों के लिए प्रिएम्बल का महत्त्व अब खत्म हुआ है, वो तो शायद कभी था हीं नहीं..

हमें बस बुरा अब लग रहा है.. क्योंकि हमें ये दिख अब रहे हैं.. वो भी इतनी भारी तादात में.. लेकिन उनके लिए ये कोई नई बात नहीं है.. वो तो कबसे इसी स्थति में जी रहे है, मर रहे हैं.. और तो और पैरों के छाले, भूखे पेट यात्रा.. मौत ये सब तो पहले भी होता था.. बस पहले इनपर कविताएं लिखने वाला कोई नहीं था..



अगर देखा जाए तो ये मजदूर कभी भी शहर के बीचों-बीच, या हमारे बीच आ ही नहीं पाए थे.. ये तो हमेशा से वहां थे.. रेलवे लाइन के किनारे या फिर किसी खाली पड़ी सरकारी जमीन पर.. ये लोग वहीं पैदा होते हैं.. और वहीं मर जाते हैं.. जैसे-जैसे सड़कें बड़ी होती जाती हैं, और शहर फैलते जाते हैं.. हमारे मजदूर शहर से उतना हीं दूर होते जाते हैं. कारण ये भी हो सकता है कि हमारे स्टेटस में कहीं भी उनकी जरुरत नहीं है..

अब मुंबई जैसी जगह को ही ले लीजिए.. वहां से पैदल घर को निकले प्रवासी मजदूरों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है.. कोई सड़क पर कुचल कर मर रहा है, तो कोई भूख-प्यास और गर्मी से दम तोड़ दे रहा है.. बस इनके बारे में बातें की जा रही हैं.. लिखी जा रही हैं.. ये सब बस आपका दिल निचोड़ लेना चाह रहे हैं. चाहे वो लेखक हों, कवि हों, फिल्मकार हों या कोई और.. बस जब ये सब खत्म हो जाएगा तो शायद उनके ऊपर एक-आध फिल्म बना दी जाएंगी..

लेकिन अब इनको कौन याद दिलाए कि ये जो आज आप देख रहे हैं, या महसूस कर रहे हैं.. ये आज की बात नहीं है.. ये सब यहां काफी अरसे से चला रहा है.. हमारी गिनती भी बस तमाशा करने वाले चंद लोगों में होती है, जिन्हें एक नया मुद्दा मिल गया है.

लेकिन मैंने ये भी देखा है.. कुछ लोग हैं जिनके मन में सवालों का अम्बार लगा पड़ा है.. उनमें से एक मैं भी हूं.. और जब इन मजदूरों को सडकों पर अपने-अपने घरों की ओर बेतहाशा भागते देखती हूं.. तो मन में ये सवाल आता कि ये आ कहां से रहें हैं? क्या ये हमारे बीच हीं थे? हमें इतने दिनों से ये दिखे क्यों नहीं, या दिखे तो नजरअंदाज क्यों होते रहे? सरकारें क्या करती रहीं?

ओ.. हो... फिर तो एकदम से याद आता है कि वो तो 20 लाख करोड़ के जीरो का हिसाब-किताब करने में लगी है.. यही पहले भी करती रही होगी शायद.. और एक समाज के तौर पर हमने क्या किया.. जिस दिन ट्रिलियन के जीरो गिने जा रहे थे, उसदिन किसी ने पूछा था क्या.. कि इस परोपकार के खेल में किसान कहां हैं? मजदूर कहां हैं? गरीब कहां हैं? दलित कहां हैं?

न....न.... हमको तो बस मोदी जी कोई टास्क पकड़ा दें.. हम तो बस उसके इंतजार में हैं.. मैं ये नहीं कह रही कि ताली, थाली, दीप, मोमबत्ती का महत्त्व नहीं.. सब अपनी-अपनी जगह ठीक हैं.. लेकिन जब 20 लाख करोड़ की बात आई तब किसी ने इसमें गरीब, किसाब, मजदूर और दलितों के हिस्से के बारे में क्यों नहीं पूछा?

अब बस मान लीजिए इस मामले में सभी फेल हो गए.. आप, हम, हमारा समाज, संविधान, नेता, अंत्री-मंत्री-संत्री.. सभी फेल..

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