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आदरणीय मोदी जी "गरीबों की मदद तो तब कर पाएंगे जब हमारी नौकरी बचेगी"

आदरणीय मोदी जी "गरीबों की मदद तो तब कर पाएंगे जब हमारी नौकरी बचेगी"

राष्ट्र के नाम संबोधन के दौरान आज मोदी जी ने जिन सात बातों में जनता का साथ मांगा. उनमें से एक गरीबों को लेकर और हमारे घरों में काम कर रहे लोगों के लिए भी थी. मोदी जी ने मांगा कि जितना हो सके, उतना ग़रीब परिवारों के भोजन की आवश्यकता पूरी करें, और अपने यहां काम कर रहे लोगों को काम से न निकालें.

और हमारा ये फर्ज बनता है कि हम मोदी जी का साथ दें इस बात में. लेकिन आदरणीय प्रधानमंत्री जी. आप ही बताएं कि ये हम कैसे करें? 

जब हमें खुद नौकरी से निकाला जा रहा है. कई सारे संस्थान है जहां छटनी हो चुकी है. कुछ में हो रही है और कुछ में हो जाएगी. मैं मीडिया से हूं तो चलिए मीडिया की ही बात करूंगी.

मीडिया कहें, कंपनी कहें, क्या कहें ये सरकारों ने कभी स्पष्ट करना उचित नहीं समझा. फर्मों के नाम पर लाखों रुपए के विज्ञापन सरकार हर दिन मीडिया संस्थानों पर फेक रही है. लेकिन फिर भी उन बड़े-छोटे संस्थानों से यही खबर आ रही है कि पत्रकारों की नौकरी पर तलवार लटक रही है.

ये संस्थान इंप्लॉय को अपनी जरूरत के हिसाब से ट्रीट करतीं हैं. पहले तो जरूरत के समय ज्यादा से ज्यादा इंटर्न और ट्रेनी भर लेते हैं. फिर जब कोई परेशानी या आपदा आई तो निकाल बाहर करते हैं. क्योंकि उनके पास देने को रुपए नहीं होते.

जितने बड़े-छोटे पत्रकारिता से जुड़े संस्थान हैं, वहां कर्मचारियों की छटनी चालू है. कुछ लोगों को अगले महीने, सप्ताह या अगले दिन से ऑफिस न आने के लिए बोल दिया गया है.

अब ऐसे में प्रधानमंत्री जी हम चाहते तो हैं. लेकिन आप ही बताएं हम कैसे गरीबों की आवश्यकताओं को पूरा करें.

मेरे कई मित्र हैं जो बड़ी-छोटी मीडिया कंपनी में कई सालों से काम कर रहे हैं. और वो फेसबुक पर लिखते हैं कि हो सकता है अगले महीने उनके पास नौकरी न रहे. कुछ को तो पहले ही निकाल दिया गया. वो लोग अब कुछ फ्रीलांस का काम ढूंढ रहे हैं. क्योंकि इस स्थति में तो कोई नौकरी भी नहीं दे रहा है.

लेकिन जो परिस्थिति देश की इस वक्त है. क्या ये वक्त सही है किसी भी इंप्लॉय को नौकरी से हटा देना. इन कंपनियों को तो इस वक्त अपने कर्मचारियों का सपोर्ट करना चाहिए. जब वो अपनी ही जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं, तो गरीबों का तो सोचना दूर की बात है.

खैर अब बात करते हैं गरीबों की.

सबको मालूम है कि जो गरीब मजदूर और किसान हैं हमारे देश के. इनका पूरा जीवन तो पहले ही कई परेशानियों से लड़ने में गुजरता है. इस कोरोना काल में तो वो दोहरी मुश्किल का सामना कर रहे हैं. कई जगह तो ये गरीब इकट्ठे रह रहे हैं. इन लोगों के पास न संक्रमण से बचने की सलाह पहुंच रही है. न ही मास्क, सैनेटाइजर, साबुन जैसी जरूरी चीजें.

ऐसे सरकार के साथ-साथ हमारा भी फर्ज है कि हम उनका साथ दें. उनकी जरूरतों को पूरा करें. बड़ी न सही तो कम से कम छोटी-छोटी जरूरतें. लेकिन हम ऐसा तब कर पाएंगे न जब हमारे पास खुद नौकरी होगी.

अलग-अलग जगहों पर कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने जिम्मेदारी समझते हुए इन गरीबों तक खाने-पीने का सामान पहुंचाया. लेकिन खबर ये भी है कि अब उनके पास भी सामान खत्म हो चुका है. राशन नहीं हैं.

एक खबर पढ़ी थी कि खाना न मिलने की वजह से एक महिला ने अपने पांच बच्चों को नदी में फेंक दिया. खबर भले ही गलत होगी, फेक होगी. लेकिन अगर ऐसा ही चलता रहा तो ये सच होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.


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