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अक्कड़-बक्कड़ बम्मे बोल..अस्सी नब्बे पूरे सौ..

"उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में, फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते"

अक्कड़-बक्कड़ बम्मे बोल..अस्सी नब्बे पूरे सौ..

जब भी मेरे बड़े भईया की बेटी रॉनिका कहती है कि मैं 10 तक काउंट करूंगी आपको छुपना है.. सच बता रही हूं उस वक्त मैं आज से करीब 20 साल पीछे चली जाती हूं.. और नजरों के सामने घर की छत की तस्वीरें आने लगती है.. 

..वो छत जिसमें बहोत सारी ईंट की दीवारें खड़ी थीं.. और वहां मोहल्ले के दोस्तों के साथ हम गदर मचाया करते थे... 

गरमी की छुट्टियां हुई नहीं कि.. बस शुरू हो गया गली-मोहल्ले के बच्चों का तांडव.. 1 से 10 तक की वो गिनती... छुपन-छुपाई और भागम भाग.. गरमी की छुट्टी होते ही हर घर का आंगन बच्चों के शोर से गूंज उठता था.. तब पूरा दिन कैसे निकल जाता था पता ही नही चलता था.. और खेल तो ऐसे-ऐसे कि आज-कल के बच्चे क्या ही खेलते होंगे.. 

हां-हां आप भी सोचिए.. थोड़ा होल्ड करिए खुद को.. और याद करिए कि आप कौन-कौन से खेल खेलते थे.. बाकी अगर दीमाग पर ज्यादा जोर न डालना चाहते हों तो चलो मैं ही बता देती हूं.. 

एक तो वो लंगडी टांग... दूसरा वो आंख मिचोली.. और हां तब लड़का-लड़की के अलग-अलग गेम जैसा कोई सीन नहीं हुआ करता था.. सभी मिलकर गुड्डें-गुड्डीयों की शादी कराते थे.. भाई साब.. चोर सिपाही खेल की हम इस कदर जिम्मेदारी उठाते थे..  मानों देश की रक्षा अब हमारे ही कंधो पर है.. और जीत जाने पर 2 दिन तक सीना गर्व से चौड़ा रहता था.. अरे हां हमारे यहां यूपी में तो बर्फ-पानी बड़ा खेला जाता था.. इसके अलावा अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल की गूंज तो हर मोहल्ले से सुनाई दे जाती थी..

नए-नए खेलों का ईजात भी तो हमसे ही होता था.. घर वालों से पिटते भी थे.. फिर भी नहीं मानते थे..

बचपन की वो यादें इतनी खास और खूबसूरत हैं कि लगता है कोई चमत्कार हो.. और मेरा वो बचपन लौट आए.. क्योंकि सब अब बड़े हो गए हैं.. वक्त ही नही रहा किसी के पास.. और उन खेलों ने तो मानो दिल के किसी कोने मे दम तोड़ दिया है..

समय बदलता ही है.. ये मालूम था.. लेकिन ये नहीं मालूम था कि इतना बदल जाएगा.. आंगन तो छोडो़.. अब तो बच्चे पार्क में भी दिखाई नही देते.. मानों सुबह होती ही नही और शामें थकी थकी सी नज़र आती है.. अब कोई भागम-भाग खलते समय गिरने के बाद रोते हुए अपने घर जाते नहीं दिखता.. 

शायद उस वक्त पी-एस 4, और मोबाइल फोन्स को इतनी तवज्जो नहीं दी जाती थी.. हां टीवी हम भी देखते थे.. लेकिन हमारे शक्तिमान, शाकालाका बूम-बूम और हातिम ताई की टक्कर का आज कोई टीवी शो है ही नहीं.. आज-कल तो बच्चे एक डिब्बे पर कैंडी क्रश करते नजर आते हैं बस..

ऐसा लगता है मानों जिन खेलों के साथ हमने अपना बचपन बिताया है.. वो कुछ साल और हमारे साथ जिंदा हैं बस..

चलो एक कहानी सुनाती हूं आपको.. अपने बचपन की.. जब मेरी कुटाई हुई थी.. मतलब मम्मी ने उस दिन जी-जान लगाकर वाइपर चलाए थे मेरे ऊपर.. 

हां तो हुआ ये था.. कि उस वक्त मेरे मोहल्ले का एक दोस्त कंचे लेकर आया था.. वो भी कलरफुल.. हां, वही कंचे.. जिनसे उस वक्त बच्चों की अमीरी और गरीबी का पैमाना मापा जाता था.. जिसके पास जितने कंचे वो उतना अमीर.. खैर.. मम्मी को कंचे और कंचे खेलने वालों से सख्त नफरत थी.. और उन्होंने मुझे वॉर्न भी किया था.. कि तुम कंचे खेलती मत दिख जाना..

अब बचपन तो बचपन होता है यार.. जिस चीज के लिए मना किया जाता है.. दिल और दीमाग वही काम करने की सलाह देता है.. तो मैं मोहल्ले के बच्चों के साथ मम्मी को कलरफुल कंचे खेलते दिख गई.. और उस वक्त सेल्फ रेस्पेक्ट और ईगो टाइप के शब्दों से हमारा कोई रिश्ता नहीं हुआ करता था.. मम्मी लोग को इससे कोई मतलब नहीं होता था कि 4 दोस्तों के सामने गरियाएंगी तो भरपूर बेज्जती होगी.. खैर.. मम्मी मुझे पकड़ कर ले गईं और वाइपर से मुझे दिल भर कर कूटा..
 
उस दिन के बाद से मैंने कंचे नहीं छुए.. इस बात में एक रत्ती भी सच्चाई नहीं है.. मैंने इसनी पिटाई के बाद भी कंचे खेले.. लेकिन छुप-छुप कर..

बहोत ही खूबसूरत था वो बचपन.. जिसमें शामें भी हुआ करतीं थी.. अब तो केवल सुबह होती  है.. और रात..

तो ये थी मेरी कहानी.. लेकिन अगर आपके बचपन की भी कोई यादगार कहानी है.. तो आप कमेंट में हमसे शेयर कर सकते हैं.. हमें भी अच्छा लगेगा.. और आपका दिल भी हल्का हो जाएगा..

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